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वैचारिक औपनिवेशिकरण क्या है

वैचारिक औपनिवेशिकरण
पिछली पोस्ट में हमने पढ़ा की अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव कैसे थे लेकिन औपनिवेशिक रण इससे और आगे लोगों की सोच पर हावी होने का प्रयास करता है यह कैसे आइए एक एग्जांपल से समझते हैं

जब अंग्रेज भारत में अपना राज्य बनाने लगे तो उनमें से कई लोगों ने भारतीयों की संस्कृति इतिहास आदि को जानने समझने का भरसक प्रयास किया वे भारतीय संस्कृति और धर्म आदि से काफी प्रभावित हुए उन्होंने कंपनी सरकार से आग्रह किया कि पारंपरिक भारतीय ज्ञान और साहित्य के अध्ययन को संरक्षण देना जरूरी है।

उनके कहने पर संस्कृत कॉलेज और मद्रासी खोले गए इस विचार के लोगों को राष्ट्रवादी कहते हैं रानी पूर्ण अर्थात वे लोग जो पूर्वी संस्कृति से प्रेरित थे।

सन 1800 के बाद कंपनी के कई और अधिकारी हुए जिन्होंने यह माना कि आधुनिक यूरोप का जान ही जानने योग्य है और यह अंग्रेजी के माध्यम से ही हो सकता है उनका मानना था कि भारतीय ज्ञान की परंपरा किसी काम की नहीं है और उस पर धन खर्च करना व्यर्थ है इन्हें अंगनावादी अर्थात अंग्रेजी संस्कृति और शिक्षा से पीड़ित लोग कहते हैं।

जब अंग्रेजी सरकार की शिक्षा नीति बनी तब आंग्ल वादी विचार के लोग अधिक प्रभावी रहे इनमें सबसे प्रसिद्ध थे थॉमस मैकाले जिन्होंने सन 1830 में अपनी सिफारिश प्रस्तुत की

मैकाले का कहना था

इस बात को सभी मानते हैं कि भारत और अरब के संपूर्ण देसी साहित्य एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक सेल्फ के बराबर ही है यूरोपीय काव्य इतिहास विज्ञान और दर्शन की पुस्तकों की तुलना में इन में कुछ भी नहीं है उनका आग्रह था कि भारतीयों की भलाई इसी में है कि उन्हें विज्ञान गणित पाश्चात्य दर्शन आदि की शिक्षा दी जाए ताकि वे अंधविश्वास और बर्बरता से मुक्त हो जाएं।

मैकाले का आग्रह था कि कुछ चुने गए भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे अंग्रेजी शासन के समर्थक बने और अन्य भारतीयों को भी सिखाए

औपनिवेशिकरण का एक तुलनात्मक अध्ययन

हमने पढ़ा कि लैटिन अमेरिका अफ्रिका इंडोनेशिया चीन भारत आदि अलग-अलग प्रकार से अपनी वशीकरण से प्रभावित हुए एक तरह का उपनिवेश ई करण लैटिन अमेरिका में देखा जा सकता है लैटिन अमेरिका में रहने वाले अधिकांश मूलनिवासी मारे गए और वहां यूरोप के लोग आकर बसे तथा अफ्रीका से लोगों को दाल बना कर जबरदस्ती वहां बसाया गया।

यूरोपीय देश इस तरह बताए गए उन निवेशकों का अपने फायदे के लिए शोषण करना चाहते थे इस का उपनिवेश के लोगों ने विरोध किया दास प्रथा बेगारी और औपनिवेशिक नीतियों के विरोध में स्वतंत्रता आंदोलन सफल रहे।

एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया वह भारत में औपनिवेशिक रण लेटिन अमेरिका सिविल न था यहां यूरोप के देशों ने अपना राज्य स्थापित किया और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप बदला किंतु इंडोनेशिया और भारत में भी फर्क था इंडोनेशिया जंगल काटकर बागान बनाए गए जिनके मालिक हॉलैंड के लोग थे।

भारत में भी पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह के बागान बने लेकिन बाकी क्षेत्रों में लगान और व्यापारिक खेती के माध्यम से किसानों का शोषण किया गया सबसे महत्वपूर्ण भारत के उद्योगों को पनपने नहीं दिया गया जिससे भारतीय कपड़ा उद्योग का विनाश हुआ।

चीन की कहानी इन सबसे अलग रही वहां शासक तो चीनी ही बने पर चीन के विभिन्न हिस्सों पर यूरोपीय देशों का वर्चस्व था जहां वे शासन की जिम्मेदारी के बिना वहां के लोगों तथा संसाधनों का दोहन करते रहे इन सब देशों में औपनिवेशिक रण के प्रतिरोध की कहानी भिन्न भिन्न है हम खुद लैटिन अमेरिका की भारत और अफ्रीका के प्रतिरोध की तुलना कर सकते हैं।

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साम्राज्यवाद क्या है साम्राज्यवाद का अर्थ

साम्राज्यवाद का अर्थ

जब कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी दुर्बल राष्ट्र के आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन पर नियंत्रण स्थापित कर उनका शोषण करता है तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं दूसरे शब्दों में जब कोई राष्ट्र शक्ति का प्रयोग कर किसी अन्य राष्ट्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेता है तथा उसके आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों का हनन करके उसे अपने नियंत्रण में ले लेता है तो ऐसा राष्ट्र साम्राज्यवादी कहलाता है और इस प्रवृत्ति को साम्राज्यवाद कहते हैं।

साम्राज्यवाद की परिभाषा

साम्राज्यवाद वह अवस्था है जिसमें पूंजीवादी राज्य शक्ति के बल पर दूसरे देशों के आर्थिक जीवन पर अपना नियंत्रण स्थापित करते हैं
                                 – डॉ. संपूर्णानंद

शक्ति और हिंसा के द्वारा किसी राष्ट्र के नागरिकों पर विदेशी शासन तक नहीं साम्राज्यवाद है।
                                              – शूमां

साम्राज्यवाद के विकास की अनुकूल परिस्थितियां

१. औद्योगिक क्रांति
अब तक एशिया और अफ्रीका के देशों में औद्योगिक क्रांति नहीं आई थी यहां होने वाले उत्पादन का उपयोग प्राचीन ढंग से हाथों द्वारा ही होता था अतः यहां पर साम्राज्यवादी देशों के लिए उपयुक्त बाजार एवं कच्चा माल उपलब्ध था।

२. सैन्य शक्ति कमजोर
एशिया एवं अफ्रीका के देश सैनिक दृष्टि से अत्यधिक कमजोर थे वे यूरोपीय शक्ति के आगे टिक नहीं सकते थे ना तो उनके पास आधुनिक हथियार होते थे और ना ही संगठन की शक्ति उन्हें प्रशिक्षण भी ऐसा नहीं दिया जाता था कि वे सक्षम सैनिकों या प्रशिक्षित सेनाओं का मुकाबला कर सके।

३. राष्ट्रीय एकता का अभाव
पश्चिमी देशों की तरह एशिया और अफ्रीका के राज्य एकता के सूत्र में बंधे हुए नहीं थे वह आपसी स्वार्थों को लेकर आपस में लड़ते झगड़ते थे वह कभी संगठित होकर बाहरी शत्रु का सामना नहीं करते थे।

४. मध्यमवर्ग का आभाव
एशिया एवं अफ्रीका के देशों में प्रभावशाली मध्यमवर्ग का अभाव था जनसाधारण राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहता था उसे अपनी रोजी रोटी जुटाने में इस सारी शक्ति लगानी पड़ती थी।

५. राजनीतिक अस्थिरता
शासक वर्ग अपनी विलासिता में डूबा रहता था प्रजा हित के कार्यों में उसकी जरा भी रुचि न थी जनता भी अपने शासकों के प्रति सहानुभूति नहीं रखती थी आए दिन विद्रोह और षडयंत्र एवं मारकाट होते रहते थे इससे प्रशासन की जड़ें कमजोर हो गई थी।

साम्राज्यवाद के प्रभाव

19वीं सदी के अंतिम दशक तक साम्राज्यवाद ने एशिया और अफ्रीका की पूरी तरह अपने पंजों में जकड़ लिया था विश्व की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या पर विदेशी शासकों ने अपना अधिकार कर लिया था साम्राज्यवाद का प्रभाव लोगों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों में पड़ा था।

सकारात्मक प्रभाव:-

१. राष्ट्रीय एकीकरण
साम्राज्यवादी देशों ने अपने उपर निवेशकों में एक ही तरह के कानून न्याय व्यवस्था और आर्थिक नीति लागू की साम्राज्यवादी देश पूरे उपनिवेश को एक राजनीतिक और आर्थिक इकाई मानकर शासन करते थे जिसके फलस्वरूप उपनिवेश की जनता में एकता और राष्ट्रीयकरण की भावना उत्पन्न हुई हमारा भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

२. यातायात और संचार के साधनों में सुधार
अपनी उपनिवेशन का पूरी तरह से शोषण के लिए साम्राज्यवादी देशों में उपनिवेश ओं में यातायात एवं संचार के साधनों में सुधार किया जिसके फलस्वरूप निवेशकों को नवीन यातायात और संचार के साधन प्राप्त हुए और वहां पर रेलवे एवं टेलीफोन जैसे साधनों का विकास हुआ।

३. आंशिक उदारीकरण
यूरोप की पूंजी पतियों का था सरकार ने अधिक लाभ कमाने के लिए निवेशकों में कुछ आधुनिक उद्योग भी लगाए।

४. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार
औपनिवेशिक देशों में अपने व्यापार व उद्योगों को चलाने के लिए बहुत अधिक संख्या में कलर को एवं छोटे कर्मचारियों की आवश्यकता को देखते हुए साम्राज्यवादी देशों ने वहां पर पाश्चात्य ढंग की शिक्षा भाषा एवं साहित्य का प्रचार प्रसार किया इसके फलस्वरूप उपनिवेश ओं में पश्चिमी विचारधारा का प्रचार हुआ सांची वहां स्वतंत्रता समानता तथा लोकतंत्र के प्रति प्रेम विकसित हुआ।

५. नए प्रदेशों की खोज
साम्राज्यवाद के प्रसार के कारण विश्व के अनेक नए प्रदेशों की खोज की गई साम्राज्य वादियों ने वहां पर अपनी उपनिवेश बताएं जिससे विश्व के विभिन्न भागों में सभ्यता और संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ।

नकारात्मक प्रभाव

१. आर्थिक शोषण

साम्राज्यवादी देश एशिया और अफ्रीका के देशों से सस्ते दामों पर कच्चा माल उठाते और फिर तैयार माल उन्हीं देशों में ऊंचे दामों पर बेचकर भारी लाभ कमाते थे और कृषि क्षेत्र में भी उन्होंने बहुत ज्यादा शोषण किया।

२. आर्थिक पिछड़ापन

साम्राज्यवादी देशों द्वारा अपने उपनिवेश ओं की कृषि और उद्योग एवं व्यापार के विकास में कोई रुचि नहीं ली जाती थी बस उनसे सिर्फ काम करवा कर बहुत ही  कम मजदूरी दिया जाता था।

३. निरंकुश शासन

साम्राज्यवादी देश अपने देश में स्वतंत्रता समानता आदि की बात करते थे किंतु अपने ही उपनिवेश ओं में उनका व्यवहार निरंकुश तथा दमनात्मक रहता था।

४. युद्ध और अशांति

यूरोपीय देश अधिक से अधिक उपनिवेश प्राप्त करना चाहते थे जिसके कारण वे आपस में लगातार युद्ध करने की स्थिति में रहते थे वह सभी जानते थे कि अधिक उपनिवेश रखने से अधिक मात्रा में कच्चा माल प्राप्त करने के स्त्रोत तथा माल बेचने के लिए बाजार उपलब्ध होंगे।

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अफ्रीका का उपनिवेशी करण का इतिहास

हमने अमेरिका में अफ्रीकी देशों को बसाई जाने के बारे में पहले ऊपर पढ़ लिया है यूरोपीय देशों द्वारा अफ्रीका के उपनिवेश ई करण की शुरुआत सन 19 वीं सदी के मध्य में हुई 1878 तक अफ्रीका की केवल 10% जमीन पर यूरोपीय देशों का कब्जा था लेकिन महज 36 वर्षों में 1914 तक लगभग सारा महावीर किसी न किसी यूरोपीय देश का उपनिवेश बन गया।

दास व्यापार

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अफ्रीका में ज्यादातर हिस्से कली लाई समूहों से आवा था जीवन यापन के लिए मुख्य साधन पशुपालन कृषि जंगल से इकट्ठे किए गए कंदमूल एवं शिकार होते थे मध्य काल में भारत पश्चिमी एशिया और यूरोप में भी अफ्रीका महाद्वीप देशों की आपूर्ति के मुख्य स्त्रोत के रूप में जाना जाता था।

कबीलाई समूह के आपसी झगड़े में जो लोग युद्ध बंदियों के रूप में पकड़े जाते थे उनको दास के रूप में भेज दिया जाता था सन 1500 के बाद उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में खेती करने के लिए जैसे जैसे मजदूरों की जरूरत पड़ी वैसे वैसे अफ्रीका महाद्वीप से ताशों का व्यापार भी बढ़ता चला गया।

कई यूरोपीय देश इस अति लाभदायक मानव व्यापार में लग गए और करोड़ों अफ्रीकी यों को बेचकर खूब मुनाफा कमाया 450 साल से अधिक चले इस व्यापार को सन 1800 और सन 1900 के बीच धीरे-धीरे बंद किया गया।

मजेदार बात यह है कि अब यूरोपीय देश या कहने लगे कि अफ्रीका में दास व्यापार को खत्म करने के लिए उन्हें अफ्रीका पर अपना राज्य बनाने की जरूरत है उनमें अब होल्ड लग गई कि कौन अफ्रीका में सबसे अधिक जमीन पर कब्जा कर पाता है।

औद्योगिक क्रांति साम्राज्यवादी होड और अफ्रीका

ब्रिटेन जैसे प्रारंभिक देश ने अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल एवं बाजार की तलाश में दुनिया के बड़े हिस्से पर खासकर एशियाई देशों पर कब्जा कर लिया था जर्मनी फ्रांस और इटली में औद्योगिक क्रांति लगभग 100 साल बाद हुई।

इन नव उद्योग देशों के लिए अफ्रीका ही एक ऐसा क्षेत्र था जिस पर कब्जा करने की संभावना थी।

वर्चस्व वादी विचारधारा 

यूरोप में इस समय कुल ऐसे विचार लोकप्रिय हो रहे थे जो यूरोपीय देशों को ज्यादा से ज्यादा उपनिवेश बनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे उपनिवेश बनाना राष्ट्रीय शक्ति का पर्याय समझा जाता था और उपनिवेश के प्रसार के लिए काम करना राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति मानी जाती थी।

यूरोप में बहुत से लोगों का मानना था कि विश्व में मनुष्यों की कई नस्लें होती है और यूरोपीय नस्ल बाकी दुनिया की नस्लों से बेहतर है।

यह मानना कि मनुष्य की नस्लें होती है और एक नस्ल को दूसरी नस्ल से बेहतर माना नस्लवाद का जाता है नस्लवादी यह भी मानते हैं कि श्रेष्ठ नस्ल के लोगों का कमजोर नसों पर राज करना या उनका शोषण करना जरूरी और स्वाभाविक है।

अफ्रीका के दक्षिणी इलाकों में जैसे-जैसे दक्षिण अफ्रीका जिंबाब्वे आदि में कई यूरोपीय लोग जाकर बसें यहां तक कि भारत से भी बहुत से लोग वहां जाकर बसें।

वे सब अपने आप को स्थानीय श्वेत लोगों से श्रेष्ठ समझते थे और उन्हें कई बार विशेषाधिकार प्राप्त थे वह जहां प्रयास करते रहे कि विभिन्न मूल के लोगों का आपस में मेल मिलाप ना हो और नस्ला आधारित विशेषाधिकार बने रहें इससे रंगभेद की नीति बनी जो सन 1994 तक चली।

औपनिवेशिक काल में एक और विचार गोरे लोगों का भुजा बहुत लोकप्रिय हुआ था इस विचार के अनुसार दूसरे महाद्वीप के लोग पिछड़े हुए हैं इसलिए यूरोप के लोगों का नैतिक दायित्व है कि उन लोगों को सभ्य बनाया जाए।

इस विचार के अनुसार यूरोपीय देशों का यह कर्तव्य है कि विशेष संसार के देशों को ज्ञान और धर्म के मुद्दों पर पथ प्रदर्शित करें इस विचार को उत्साहित होकर बहुत से लोग अफ्रीका में इस आई या फिर आधुनिक विज्ञान वह तार्किक सोच के प्रचार-प्रसार में भी लग गए।

फरान जैसे कई यूरोपीय देश अपने उपनिवेश ओं में अफ्रीकी लोगों का एक ऐसा समूह तैयार करना चाहते थे जो यूरोपीय भाषा और संस्कृति धर्म और विचारों को अपनाने और औपनिवेशिक शासन की मदद करें इस उद्देश्य से अफ्रीका में कई यूरोपीय विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान खोले गए।

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चीन में उपनिवेशवाद की कहानी जानें हिंदी में

जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों के हिसाब से चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश था 17वीं सदी में चीन में मांग क्यों वंश का शासन आया मांजू शासनकाल में चीन के साम्राज्य की सीमाओं में लगातार विस्तार हुआ और वर्तमान चीन के अलावा मंगोलिया तिब्बत इत्यादि इस राज्य के हिस्से बने इसके अलावा चीन के शासकों का प्रभाव क्षेत्र कोरिया वियतनाम आदि देशों तक फैला हुआ था यह सभी राज्य चीन के सम्राट को नजराना भेंट करते थे।

मानती साम्राज्य मुख्यतः एक व्यवस्थित नौकरशाही के द्वारा संचालित था इसमें नियुक्ति परीक्षा के माध्यम से होती कि कोई भी इस परीक्षा में शामिल होकर कामयाब हो सकता था क्योंकि इसकी तैयारी काफी कठिन थी उसमें केवल संपन्न नकुल के लोग ही भाग ले पाते थे।

चीन का सामान मुख्यतः एक ही थी हर शाम आज था ज्यादातर आबादी अपनी आजीविका के लिए खेती पर ही निर्भर थी राज्य की आय का मुख्य साधन खेती पर लगाया गया लगान था लगान की वसूली के लिए अधिकारियों का एक विशाल समूह तैनात था।

कृषि के अतिरिक्त चीन में खनन एवं विनिर्माण उद्योग भी विकसित था चीन में नमक चांदी की और लोहे की विस्तृत खाने थी जहां पर चीन के खुद के उपयोग लायक खनिज उसका प्राप्त हो सकता था चीनी मिट्टी के बर्तन और रेशम के कपड़ों के लिए चीन हमेशा से ही प्रसिद्ध रहा था।

पूरी दुनिया से व्यापारी किन-किन वस्तुओं को खरीद के लिए आते थे चीन में अवश्य दी के रूप में पाए जाने वाला एक पेय पदार्थ चाय 18 वीं सदी में यूरोप में बहुत लोकप्रिय हुआ इसके बाद चाय के व्यापार के लिए भी चीन में यूरोपीय व्यापारी आने लगे संक्षेप में अगर कहे तो चीन अपनी जरूरत की सारी वस्तु की पूर्ति खुद से ही कर लेता था यहां एक तरह से आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था थी।

चीन के शासक चीन के बाहरी देशों के किसी भी तरह से प्रभाव से मुक्त रखना चाहते थे इसलिए उन्होंने विदेशी व्यापार पर कड़ा नियंत्रण स्थापित कर रखा था विदेशों के साथ व्यापार करने के लिए चीन बंदरगाह अधिकृत कर रखे थे कैंटन मकाउ और निगम व यूरोपीय व्यापारी चीन में इन्हीं बंदरगाहों तक जा सकते थे यहां से चीन के स्थानीय व्यापारी समूह विदेशी माल को पूरे चीन में ले जाते थे और चीन की जो वस्तुएं उन्हें चाहिए होती थी उसे विदेशी व्यापारियों को देते थे इन्हीं बंदरगाहों में यूरोपीय बस्तियां थी।

अंग्रेजी व्यापार और अफीम युद्ध

यूरोपीय व्यापारी लगातार यह कोशिश कर रहे थे कि उन्हें चीन से व्यापार करने का मौका मिले जिनके साथ व्यापार करने में भी सबसे पहले डच कंपनी को सफलता मिली अंग्रेजों ने जब चीज में व्यापार करना शुरू किया तो वे चाहते थे कि उन्हें कुछ भी आ जाते मिले लेकिन सन 1830 तक यहां संभव नहीं हो सका।

चीन के साथ यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनसे चीन में भेजने के लिए कुछ नहीं था फलता है यूरोपीय व्यापारियों को अपने देश से सोना चांदी चीन में लाना पड़ा था।

इस तरह व्यापार संतुलन हमेशा चीन के पक्ष में रहता था इस बीच अंग्रेजों का शासन भारत पर बना अंग्रेज भारत से अफीम खरीदकर चीन में बेचने लगे इस से मिले धन से भी चीन से चाय रेशम आदि खरीदने लगे इस प्रकार उन्हें भुगतान के लिए इंग्लैंड से सोना चांदी लाने की जरूरत नहीं रही उन्होंने कोशिश की कि चीन से ज्यादा से ज्यादा अफीम बीके ताकि उन्हें अधिक लाभ हो।

चीन में अफीम का व्यापार अवैध था मूल्य तहत तस्करी के द्वारा होता था कैंटन बंदरगाह से यह अफीम भ्रष्ट चीनी अफसरों व व्यापारियों के द्वारा चीन के अन्य हिस्सों में पहुंचाया जाता था अफीम के इस व्यापार और अंदरूनी इलाकों तक इसकी सप्लाई का कुछ ही सालों में यहां असर हुआ कि बहुत बड़ी संख्या में चीन के लोग अफीम की लत के शिकार हो गए।

जब चीनी शासन को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने अंग्रेजों के व्यापारिक अध्याय को समाप्त कर दिए और कैंटन से उन्हें निष्कासित करने का आदेश दिया इसके कारण सन 1839 से 42 में चीन और अंग्रेजो के बीच युद्ध हुआ जिसे प्रथम अफीम युद्ध कहते हैं इस युद्ध में चीन की पराजय हुई सन 1842 में उसे एक अपमानजनक संधि करने पर विवश होना पड़ा इस संधि को नाम की संधि कहते हैं इस संधि के अनुसार अंग्रेजों को पूरे चीन में बिना किसी रूकावट के व्यापार का अधिकार मिला दूसरा अंग्रेजों को चीनी भूमि पर अपना व्यापारिक बच्चे आने की अनुमति मिली जिसमें अंग्रेजों का अपना कानून चल सकता था।

इसके अलावा चीन ने ब्रिटेन को एक बहुत बड़ी राष्ट्रीय हर्जाने के रूप में दी इस संधि में एक और सख्त यह जोड़ी गई कि अगर चीन किसी दूसरी यूरोपीय कंपनी को किसी भी तरह की बारिश की छूट देगा तो वह सोता ही अंग्रेजों को भी मिल जाएगी।

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चीन पर बढ़ता हुआ विदेशी विदेशी प्रभाव

अफीम युद्ध की हार से चीनी सैन्य शक्ति की कमजोरियों के बारे में दुनिया को पता चल गया था अन्य यूरोपीय शक्तियां भी चीन में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करने लगी सन 1844 में चीन ने फ्रांस और अमेरिका के साथ बिना किंग की संधि की तरह ही संध्या की इन संधियों में फ्रांस एवं अमेरिका को भी चीन के शासकों से बहुत सी व्यापारिक की आयतें मिली कुछ इसी तरह की संधि दूसरे यूरोपीय देशों जैसे रूस जर्मनी इत्यादि ने भी चीन के साथ कि चीन के इलाकों में अलग-अलग देशों का प्रभाव क्षेत्र बन गए।

खुले द्वार की नीति

चीन के पूर्व में एक छोटा सा देश है जापान सन 18 सो 95 में जापान ने चीन पर आक्रमण किया जिसमें उसकी विजय हुई अब जापान ने दी चीन को उसी प्रकार की संधि करने को विवश किया जैसे बाकी है यूरोपीय देशों ने साथ हुई थी।

इस तरह चीन का एक बड़ा हिस्सा अलग अलग यूरोपीय एवं एशियाई साम्राज्यवादी देशों के प्रभाव में आ गया।

संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से चीन में व्यापार कर रहा था उसे चिंता हुई कि अगर सभी यूरोपीय देशों ने चीन को अपने उन निवेशकों में बांट लिया तो अमेरिका का व्यापार बंद हो जाएगा अमेरिका ने इस तरह चीन के भिन्न-भिन्न प्रभाव क्षेत्रों में बांटने का विरोध किया और इसके स्थान पर खुले द्वार की नीति की घोषणा की।

इसका अर्थ था कि सभी देशों ने चीन में व्यापार करेंगे और किसी भी देश का कोई निश्चित प्रभाव क्षेत्र नहीं होगा थोड़ी ना नुकुर के बाद सारे देशों ने इस संधि को मान लिया।

लेकिन ऐसा क्यों हो रहा था सन अट्ठारह सौ पचास तक फ्रांस जर्मनी एवं अमेरिका ने औद्योगिकरण हो चुका था और यह देश सभी नए संभावित बाजारों पर कब्जा करना चाहते थे हमने ऊपर पड़ा है कि उस समय चीन की जनसंख्या सबसे ज्यादा थी बड़ी जनसंख्या का अर्थ बड़ा बाजार भी होता है।

इसलिए दुनिया के सारे औद्योगिक 123 चीन को अपने प्रभाव में लाना चाहते थे एक दूसरी महत्वपूर्ण वजह थी पूंजी के निवेश के लिए नए क्षेत्र तलाशना औद्योगिकरण के पश्चात हुए फायदों से यूरोप में काफी बड़ा मात्रा में पूंजी जमा हो गई थी जिससे वह उपनिवेश में रेल लाइनें बिछाने व खदान साबित करने में लगाना चाहते थे।

विदेशी नियंत्रण का विरोध हमने पढ़ा कि यूरोपीय देश जिन पर सीधा कब जाना करके अपने हित साध रहे थे जिनका शासन अभी भी चीन के ही सम्राट के हाथों में था लेकिन बहुत बड़े क्षेत्र पर उसका हुक्म नहीं चलता था ऊपर से उसे बहुत बड़ी रकम हर्जाने के रूप में देनी पड़ती थी जिसके कारण आम जनता पर कर का भार बढ़ता गया।

लगातार विदेशी शक्तियों से हो रही हार एवं अपमानजनक संधियों से चीन के लोग बदलाव की जरूरत महसूस कर रहे थे इनमें चीन के अधिकारियों का एक समूह भी था इन लोगों ने आधुनिकीकरण के लिए प्रयास किए।

उनका मानना था कि यूरोप के लोग अपनी सेना और हथियारों के कारण जीत रहे हैं तो चीन में भी आधुनिक हथियार के कारखाने स्थापित किए जाएं लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो पाए।

इन सभी घटनाक्रम ने लोगों को बहुत ही निराशा का भाव ख्याल आया क्योंकि चीन के शासक वर्ग विदेशियों के खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे थे इसलिए जनता सम्राट के खिलाफ हो गई सन अट्ठारह सौ पचास से सन उन्नीस सौ के बीच में कई विद्रोह हुए जिन्हें दबाने के लिए चीन सरकार ने विदेशी मदद ली।

गरीब किसानों और मजदूरों ने विदेशियों को दिए गए विशेषाधिकार के खिलाफ एक गुप्त संगठन बनाया जिसे भी बॉक्सर या मुक्केबाज के नाम से पुकारते थे उनका मानना था कि खास तरह के शारीरिक व्यायाम से बिजी हो जाएंगे और विदेशी गोलियों उनके शरीर को भेद नहीं चलेंगी।

सन 1900 मैं एक बहुराष्ट्रीय सेना ने बीजिंग पर आक्रमण करके इन विद्रोहियों को हरा दिया व्यापक लूटपाट की और लोगों को निर्दयता से मार डाला कि नहीं सकता इस पूरे मामले में मुख दर्शक बनी रही।

बॉक्सर विद्रोह की असफलता के बावजूद राष्ट्रवाद की एक मजबूत धारा का जन्म चीन में हो चुका था परिणामस्वरूप सन 1911 में मानसून शासन को खत्म करके चीन में गणतंत्र स्थापित किया गया लेकिन चीन को वास्तविक स्वतंत्रता सन 1949 में क्रांति के द्वारा ही मिली।

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उपनिवेशवाद और अफ्रीकी प्रतिरोध क्या था?

अफ्रीका के निवासियों ने अपनी सीमित साधनों के बावजूद यूरोपीय शक्तियों का भरपूर प्रतिरोध किया लेकिन उनके ज्यादातर प्रतिरोध अंततः सर्फर सफल रहे ब्रिटिश पत्रकार एडवांटम मोरेल ने कुछ समय अफ़्रीका में बिताया था और अफ्रीका पर एक किताब लिखी थी द ब्लैक मेंस बर्डन उसमें उन्होंने अफ्रीकी लोगों के प्रतिरोध की असहाय स्थिति को इन शब्दों में लिखा है।

जो अन्याय और दुर्व्यवहार एक अफ्रीकी अपने जीवन में सहायता है उसका विरोध किसी भी अफ्रीकन के द्वारा अफ्रीका में कहीं भी संभव नहीं है अफ्रीकी मूल के निवासी यूरोपीय श्वेत नस्ल के पूंजीवादी शोषण साम्राज्यवाद और संवाद के सामने बिल्कुल असहाय है।

माझी माझी विद्रोह

पूर्वी अफ्रीका में जर्मनी का नियंत्रण था जर्मन शासन इस क्षेत्र के लोगों को खाद्यान्न के स्थान पर नकदी फसल कपास की खेती करने के लिए जबरदस्ती कर रहे थे यह कपास मुख्यतः जर्मनी के कारखानों के लिए जरूरी था सन उन्नीस सौ पांच में एकाएक अफवाह फैली कि जादुई पवित्र जल को अगर शरीर पर छिड़क दिया जाए तो जर्मन गोलियों पानी बन जाएंगी ।

लगभग 20 आदिवासी समुदाय के लोग जर्मन हुकूमत से लड़ने के लिए एक हो गए उनका विश्वास था कि उनके भगवान ने उन्हें इस लड़ाई के लिए आदेश दिया है और उनके पूर्वज इस युद्ध में उनकी रक्षा करेंगे।

यह विद्रोह माझी माझी विद्रोह के नाम से जाना जाता है किंतु जब इन विद्रोही सैनिकों ने अपने बालों के साथ जर्मन सैन्य ठिकाने पर हमला किया तो जर्मन मशीन गन के करीब 75000 आदिवासी मारे गए इसके बाद आकाल में लगभग दोगुने लोग मारे गए।

इथोपिया का सफल प्रतिरोध

इथोपिया एकमात्र अफ्रीकी देश था जिसने सफलतापूर्वक यूरोपीय देशों का प्रतिरोध किया सन् 1889 में मैंने लिख दो पिया का शासक बना उस समय बरेली में सम्मेलन के बाद ब्रिटिश प्रिंट एवं इटालियन लोग सभी इथोपिया को अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने की कोशिश कर रहे थे मैंने लिख ने बड़ी चालाकी से इनको एक दूसरे के खिलाफ उपयोग किया इन सबके बीच उसने फ्रांस और रूस से भारी मात्रा में गोला-बारूद और बंदूकें खरीद रखी थी।

सन 1889 में इटली ने मैंने लिख के साथ एक संधि की संधि के लिए जो दस्तावेज बनाए गए थे वही जो पिया और इटालियन भाषा में अलग-अलग थे संधि के अनुसार इथियोपिया का एक छोटा हिस्सा इटली को देना था लेकिन इटली ने पूरे इथोपिया को अपने संरक्षण में लेने का दावा किया था।

इसी बीच में इटली के सेना उतरी इथियोपिया में आगे बढ़ने लगी फतेह मैंने लिख ने इटली के खिलाफ़ युद्ध की घोषणा कर दी सन 1896 में हुए एडवा की लड़ाई में क्यों किया कि सेना ने इटली के सेना को हराकर नया इतिहास बनाया।

टांगों में रबड़ की खेती और स्थानीय समुदायों का नरसंहार

बेल्जियम के शासक लियोपोल्ड द्वितीय अफ्रीका में अपनी निजी जागीर बनाना चाहता था उसने सन 1879 से सन 1882 कांगो के जनजातीय सरदारों से चलकर कोई संध्या की जिनके आधार पर उसने कांगो में 23 लाख वर्ग किलोमीटर विभाग पर कब्जा कर लिया यह बेल्जियम से करीब 80 गुना ज्यादा बढ़ा क्षेत्र था यह उसकी निजी संपत्ति थी।

लियोपोल्ड ने आदेश दिया कि कांगो के सब लोग जंगलों में रबड़ हाथी रात आधी लाकर सरकार को निर्धारित कीमतों पर देंगे जो अपने हिस्से का रावण नहीं देगा उसे मार डालने या हाथ काटने का आदेश थे।

लोगों से राजा के लिए सामान एकत्र करने का ठेका कई कंपनियों को दिया गया था इन कंपनियों ने वहां के मूल निवासियों के साथ क्रूरता की एक नई मिसाल कायम कर दी अगर कोई स्थानीय व्यक्ति निश्चित मात्रा में रबड़ नहीं ला पाता था तो वे उनका हाथ काट लेते थे।

माना जाता है कि कम से कम सौ लाख कांगो वासी इस अत्याचार के कारण मारे गए अंततः इस व्यवस्था को सन 1908 में समाप्त किया गया और टांगों का शासन बेल्जियम की संसद ने अपने हाथों में ले लिया।

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भारत में उपनिवेशवाद सन् 1756 से सन 1900

भारत में उपनिवेशवाद सन् 1756 से सन 1900
हमने पढ़ाई की इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1757 में बंगाल के नवाब को प्लासी की लड़ाई में हराकर भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश साम्राज्य की शुरुआत की थी इसके बाद किस तरह धीरे-धीरे पूरा भारत उनके अधीन हो गया इस पाठ में हम यहां समझने की कोशिश करेंगे कि किस प्रकार औपनिवेशिक शासन ने भारत के समाज को प्रभावित किया।

सन 1757 के बाद भारत का उपनिवेश ई करण कई चरणों से गुजरा प्रत्येक चरण का स्वरूप ब्रिटेन की बदलती जरूरत तथा भारतीयों के प्रतिरोध कौन से निर्धारित हुआ एक और उपनिवेश नीतियों के कारण भारत एक संपन्न देश से गरीब  बन गया।

दूसरी और भारत के लोग अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण कर पाए और उसे लोकतंत्र और समानता की ओर ले जा पाए हमने भारतीय राष्ट्रवाद लोकतंत्र और समानता के लिए संघर्ष की कहानी पड़ी यहां हम अपनी विशेष नीतियों और उनके प्रभावों के बारे में नीचे पड़ेंगे।

एकाधिकार व्यापार का दौर

शुरुआती दौर में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भारत में दो लक्ष्य थे पहला लक्ष्य था भारत के साथ व्यापार में एक अधिकारी स्थापित करना ईस्ट इंडिया कंपनी यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि वह विदेशी में भारत माल को भेजें ताकि कम से कम दाम में भारतीय किसानों व कारीगरों का सामान खरीद कर अधिक से अधिक दाम में दुनिया भर में बेच सकें।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय व्यापार पर हस्तशिल्प के उत्पादन का अधिक एकाधिकार स्थापित करने के लिए राजनीतिक शक्ति का प्रयोग किया पहले से व्यापार में लगे भारतीय व्यापारियों को या तो व्यापार से ही हटा दिया गया या फिर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए व्यापार करने को विवश किया गया इन भारतीय शिल्पीओं एवं बुनकरों को अपना माल कम कीमत पर ब्रिटिश कंपनी को बेचने के लिए विवश किया गया।

इन सबके कारण भारत का विदेशों से व्यापार तो काफी बढ़ गया लेकिन बुनकर एवं शिल्पी यों को उचित कीमत कीमत नहीं मिली।

दूसरी और लक्ष्य था भारत से प्राप्त राजस्व नियंत्रण कर उसे ब्रिटेन के हित में उपयोग करना ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में तथा संपूर्ण एशिया व अफ्रीका में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए युद्ध करना पड़ता था इसके लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता थी इसे भारत से प्राप्त राजस्व श्रीजी निकालने की कोशिश हुई।

ज्यादा नागेश्वर के लिए ज्यादा भूभाग पर नियंत्रण जरूरी था इसके लिए भारत के विभिन्न भागों को जीतकर ब्रिटिश भारत में मिलाने की कोशिश हुई।

जो इलाके कंपनी के अधीन हुए वहां पर कंपनी ने नई प्रकार की भू राजस्व व्यवस्था लागू की जिसके तहत जमींदार जमीन के मालिक बने और जमीन पर निजी स्वामित्व स्थापित हुआ।

अंग्रेजों की उम्मीद थी कि इससे उन्हें अधिकतम भू राजस्व मिलेगा किस नीति का दूरगामी असर यहां पड़ा कि किसानों की स्थिति लगातार बिगड़ती गई और वे अभूतपूर्व मानव निर्मित आकलन के शिकार होने लगे वह बढ़ते हुए राजस्व को अदा करने के लिए ऋण लेकर साहूकार के चंगुल में फंसते गए।

दूसरा दा और इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति और भारत का उपनिवेशी करण

सन 1750 से सन 1800 में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति शुरू हो गई थी लेखाधिकारी व्यवस्था उद्योग पतियों के हित के अनुकूल नहीं थी वे नहीं चाहते थे कि भारतीय कपड़े यूरोप में बिके उल्टा वे चाहते थे कि भारत उनके कारखानों में निर्मित कपड़े खरीदे।

उन्होंने दबाव डाला कि भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण समाप्त हो धीरे-धीरे ब्रिटेन की संसद ने भारतीय मामलों पर दखल बढ़ाया और ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को सन 1813 में समाप्त कर दिया सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद संसद ने भारत का प्रशासन सीधे अपने हाथों में ले लिया।

भारत की व्यापारिक नीतियों में बहुत सारे बदलाव किए गए ब्रिटेन से आने वाले सामानों का आयात शुल्क को या तो कम कर दिया गया या फिर समाप्त कर दिया गया ताकि भारत में अंग्रेजी का खानों में बना सामान बिक सके ।

लाखों जुलाहे जो कल तक कपड़ा बनाने के काम में लगे हुए थे ग्रज कार हो गए कोई काम-धंधा नहीं मिलने पर वे भी खेती करने लगे इससे कृषि का आबादी का दबाव बढ़ने लगा उतनी ही जमीन पर अधिक लोग निर्भर हो गए इस पूरी प्रक्रिया को भारत का निरूद्योगी करण कहा जाता है इससे हिंदुस्तान गरीब देशों की श्रेणी में आ गया।

भारत के गरीब होने के पीछे एक और कारण था विभिन्न तरीकों से अंग्रेजों द्वारा भारत से इंग्लैंड भेजा जाना भारतीय राजाओं के खजाने की लूट अंग्रेजी सैनिकों व अफसरों के वेतन आदि के रूप में भारतीय धन इंग्लैंड भेजा गया यह भुगतान भारत के किसानों के द्वारा चुकाए गए करोड़ से होता था।

औद्योगिकरण के लिए नील कपास पटसन जैसे कच्चे माल और अनाज चाय और शक्कर जैसी कृषि उपज की अधिक जरूरत थी इन्हीं सस्ते में खरीदकर वे ब्रिटेन भेजना चाहते थे औपनिवेशिक सरकार ने किसानों पर दबाव डाला कि वे इन्हें व्यापारिक फसलों के रूप में उगाए और बेचे क्योंकि किसानों को लगान चुकाना था वे विवश थे व्यापारिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक सिंचाई परियोजनाओं को अंजाम दिया जिससे खेती के लिए पर्याप्त पानी मिल सके।

साथ साथ उसने देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेल लाइनें बिछाई भारत में रेलवे के विकास के लिए अधिकांश सामान से खरीदा गया।

इस कारण वहां के लोहा उद्योग को काफी फायदा हुआ इस प्रकार भारतीय कृषि को ब्रिटेन उद्योगों की जरूरत के अनुसार ढाला गया नकदी फसल का उत्पादन बढ़ा और कपड़ों की जगह उनका निर्यात होने लगा।