Categories
Colonialism

वैचारिक औपनिवेशिकरण क्या है

वैचारिक औपनिवेशिकरण
पिछली पोस्ट में हमने पढ़ा की अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव कैसे थे लेकिन औपनिवेशिक रण इससे और आगे लोगों की सोच पर हावी होने का प्रयास करता है यह कैसे आइए एक एग्जांपल से समझते हैं

जब अंग्रेज भारत में अपना राज्य बनाने लगे तो उनमें से कई लोगों ने भारतीयों की संस्कृति इतिहास आदि को जानने समझने का भरसक प्रयास किया वे भारतीय संस्कृति और धर्म आदि से काफी प्रभावित हुए उन्होंने कंपनी सरकार से आग्रह किया कि पारंपरिक भारतीय ज्ञान और साहित्य के अध्ययन को संरक्षण देना जरूरी है।

उनके कहने पर संस्कृत कॉलेज और मद्रासी खोले गए इस विचार के लोगों को राष्ट्रवादी कहते हैं रानी पूर्ण अर्थात वे लोग जो पूर्वी संस्कृति से प्रेरित थे।

सन 1800 के बाद कंपनी के कई और अधिकारी हुए जिन्होंने यह माना कि आधुनिक यूरोप का जान ही जानने योग्य है और यह अंग्रेजी के माध्यम से ही हो सकता है उनका मानना था कि भारतीय ज्ञान की परंपरा किसी काम की नहीं है और उस पर धन खर्च करना व्यर्थ है इन्हें अंगनावादी अर्थात अंग्रेजी संस्कृति और शिक्षा से पीड़ित लोग कहते हैं।

जब अंग्रेजी सरकार की शिक्षा नीति बनी तब आंग्ल वादी विचार के लोग अधिक प्रभावी रहे इनमें सबसे प्रसिद्ध थे थॉमस मैकाले जिन्होंने सन 1830 में अपनी सिफारिश प्रस्तुत की

मैकाले का कहना था

इस बात को सभी मानते हैं कि भारत और अरब के संपूर्ण देसी साहित्य एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक सेल्फ के बराबर ही है यूरोपीय काव्य इतिहास विज्ञान और दर्शन की पुस्तकों की तुलना में इन में कुछ भी नहीं है उनका आग्रह था कि भारतीयों की भलाई इसी में है कि उन्हें विज्ञान गणित पाश्चात्य दर्शन आदि की शिक्षा दी जाए ताकि वे अंधविश्वास और बर्बरता से मुक्त हो जाएं।

मैकाले का आग्रह था कि कुछ चुने गए भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे अंग्रेजी शासन के समर्थक बने और अन्य भारतीयों को भी सिखाए

औपनिवेशिकरण का एक तुलनात्मक अध्ययन

हमने पढ़ा कि लैटिन अमेरिका अफ्रिका इंडोनेशिया चीन भारत आदि अलग-अलग प्रकार से अपनी वशीकरण से प्रभावित हुए एक तरह का उपनिवेश ई करण लैटिन अमेरिका में देखा जा सकता है लैटिन अमेरिका में रहने वाले अधिकांश मूलनिवासी मारे गए और वहां यूरोप के लोग आकर बसे तथा अफ्रीका से लोगों को दाल बना कर जबरदस्ती वहां बसाया गया।

यूरोपीय देश इस तरह बताए गए उन निवेशकों का अपने फायदे के लिए शोषण करना चाहते थे इस का उपनिवेश के लोगों ने विरोध किया दास प्रथा बेगारी और औपनिवेशिक नीतियों के विरोध में स्वतंत्रता आंदोलन सफल रहे।

एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया वह भारत में औपनिवेशिक रण लेटिन अमेरिका सिविल न था यहां यूरोप के देशों ने अपना राज्य स्थापित किया और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप बदला किंतु इंडोनेशिया और भारत में भी फर्क था इंडोनेशिया जंगल काटकर बागान बनाए गए जिनके मालिक हॉलैंड के लोग थे।

भारत में भी पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह के बागान बने लेकिन बाकी क्षेत्रों में लगान और व्यापारिक खेती के माध्यम से किसानों का शोषण किया गया सबसे महत्वपूर्ण भारत के उद्योगों को पनपने नहीं दिया गया जिससे भारतीय कपड़ा उद्योग का विनाश हुआ।

चीन की कहानी इन सबसे अलग रही वहां शासक तो चीनी ही बने पर चीन के विभिन्न हिस्सों पर यूरोपीय देशों का वर्चस्व था जहां वे शासन की जिम्मेदारी के बिना वहां के लोगों तथा संसाधनों का दोहन करते रहे इन सब देशों में औपनिवेशिक रण के प्रतिरोध की कहानी भिन्न भिन्न है हम खुद लैटिन अमेरिका की भारत और अफ्रीका के प्रतिरोध की तुलना कर सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *