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Internet se paise kamane ke 8 tarike

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blog  banakar  paise   kaise  kamaye

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History

संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका l India’s role in the United Nations

1. संघ की स्थापना और चार्टर निर्माण में

सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लेकर भारत उनका मन संस्थापक देशों में से एक सदस्य बना मानव अधिकार और मौलिक स्वतंत्र गांव को भारतीय प्रतिनिधियों की सिफारिश पर चार्टर में जोड़ा गया।

2. संघ की सदस्य संख्या बढ़ाने में

संघ में अपने विरोधी गुट को प्रवेश देने में कई देश रुकावट डालते थे परंतु भारत ने अपने आक्रमणकारी चीन के परिवेश का समर्थन कर संघ की सदस्य संख्या बढ़ाने में प्रेरक कार्य किया।

3. संघ के विभिन्न अंगों का संचालन में

सन 1954 में भारत की सिम की विजय लक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा के आठवीं अधिवेशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुई

डॉ राधाकृष्णन और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद यूनेस्को के प्रधान निर्वाचित हुए राजकुमारी अमृत कौर विश्व स्वास्थ्य संगठन डॉ बी आर सी एन विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन बाबू जगजीवन राम अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन डॉ एच जे भाभा अणुशक्ति आयोग के अध्यक्ष डॉ चिंतामणि देशमुख अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अध्यक्ष डॉ नागेंद्र सिंह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जाकर संघ के संचालन में सहयोग कर चुके हैं।

4.संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति व सुरक्षा संबंधी कार्य

1. कोरिया समस्या

उत्तर और दक्षिण कोरिया के युद्ध में विश्वयुद्ध की
संभावनाएं बढ़ रही थी संयुक्त राष्ट्र ने वहां शांति स्थापित करने 16 राष्ट्रों की सेना भेजी उस में भारतीय सैनिक भी शामिल थे जिन्होंने युद्ध बंदियों की अदला बदली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2. हंगरी समस्या

1956 में प्रतिक्रियावादी तत्वों ने हंगरी में विद्रोह कर दिया हंगरी सरकार के अनुरोध पर रूस ने सेना भेजकर विद्रोह को दबा दिया संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के हंगरी में शांति स्थापना के प्रयासों का समर्थन किया।

3. स्वेज नहर समस्या

26 जुलाई 1956 को मिश्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया स्वेज नहर पर अपना अधिकार भी स्थापित करने के लिए इंग्लैंड फ्रांस और इजरायल ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया भारत ने इन आक्रमणकारी देशों की निंदा कर युद्ध बंद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

4. कांगो समस्या

कांगो के स्वतंत्र होने पर बेल्जियम ने उस पर हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेश से भारत ने अपनी सेना की बड़ी टुकड़ी भेजकर कांगो में युद्ध के खतरे को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. निशस्त्रीकरण हेतु किए गए प्रयास

भारत ने सहयोगी देशों की मदद से सन 1961 में महासभा में आणविक परीक्षणों को बंद करने का प्रस्ताव रखा 1963 में ब्रिटेन अमेरिका और सोवियत रूस के आणविक परीक्षण प्रतिबंध संधि का भारत ने स्वागत किया सन् 1986 में राजीव गांधी ने महासभा में निशस्त्रीकरण की पुल की और सन 1988 से 22 जून तक एक चरणबद्ध कार्यक्रम चलाकर तहत पूर्ण का सुझाव दिया।

6. रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष

अफ्रीका और रोड एशिया की गोरी सरकारों द्वारा श्वेतांबर किए जाने वाले अत्याचारों का भारत में प्रबल विरोध किया साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ पर भी भारत ने इस हेतु लगातार दबाव बनाए रखा अल्लाह 22 दिसंबर 1993 में अफ्रीका नेताओं को भी बराबरी का अधिकार मिल गया।

7. उपनिवेशवाद समाप्ति हेतु किए गए प्रयास

भारत में उपनिवेशवाद की समाप्ति और वहां की जनता की स्वतंत्रता के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में जो प्रस्ताव रखा उसे स्वीकार कर लिया गया बांग्लादेश और नामीबिया को मुक्त कराने भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

8. मानव अधिकारों की रक्षा

भारत मानव अधिकारों का सदैव समर्थक रहा 21 दिसंबर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकार आयोग का गठन किया भारत ने उच्चायोग के सुझावों को मान्यता दी यह संयुक्त राष्ट्र महासचिव और महासभा के अधीन काम करते हुए नागरिक सामाजिक सांस्कृतिक और अन्य सभी प्रकार के मानव अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए उत्तरदाई है।

9. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में

भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देशों पर विशेष बल दिया विकसित देशों से अविकसित देशों के लिए अधिकाधिक आर्थिक सहायता देने का अपील की 24 अक्टूबर 1985 में राजीव गांधी ने महासभा के सदस्य देशों से अपील की कि विश्व के शांति के प्रति स्वयं को समर्पित करते हुए विश्व भुखमरी को दूर करने के लिए संघर्ष करें।

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History

भारत में उपनिवेशवाद सन् 1756 से सन 1900

हमने पढ़ाई की इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सन 1757 में बंगाल के नवाब को प्लासी की लड़ाई में हराकर भारतीय उपमहाद्वीप पर ब्रिटिश साम्राज्य की शुरुआत की थी इसके बाद किस तरह धीरे-धीरे पूरा भारत उनके अधीन हो गया इस पाठ में हम यहां समझने की कोशिश करेंगे कि किस प्रकार औपनिवेशिक शासन ने भारत के समाज को प्रभावित किया।

सन 1757 के बाद भारत का उपनिवेश ई करण कई चरणों से गुजरा प्रत्येक चरण का स्वरूप ब्रिटेन की बदलती जरूरत तथा भारतीयों के प्रतिरोध कौन से निर्धारित हुआ एक और उपनिवेश नीतियों के कारण भारत एक संपन्न देश से गरीब  बन गया।

दूसरी और भारत के लोग अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए एक आधुनिक राष्ट्र का निर्माण कर पाए और उसे लोकतंत्र और समानता की ओर ले जा पाए हमने भारतीय राष्ट्रवाद लोकतंत्र और समानता के लिए संघर्ष की कहानी पड़ी यहां हम अपनी विशेष नीतियों और उनके प्रभावों के बारे में नीचे पड़ेंगे।

एकाधिकार व्यापार का दौर

शुरुआती दौर में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के भारत में दो लक्ष्य थे पहला लक्ष्य था भारत के साथ व्यापार में एक अधिकारी स्थापित करना ईस्ट इंडिया कंपनी यह सुनिश्चित करना चाहती थी कि वह विदेशी में भारत माल को भेजें ताकि कम से कम दाम में भारतीय किसानों व कारीगरों का सामान खरीद कर अधिक से अधिक दाम में दुनिया भर में बेच सकें।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय व्यापार पर हस्तशिल्प के उत्पादन का अधिक एकाधिकार स्थापित करने के लिए राजनीतिक शक्ति का प्रयोग किया पहले से व्यापार में लगे भारतीय व्यापारियों को या तो व्यापार से ही हटा दिया गया या फिर ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए व्यापार करने को विवश किया गया इन भारतीय शिल्पीओं एवं बुनकरों को अपना माल कम कीमत पर ब्रिटिश कंपनी को बेचने के लिए विवश किया गया।

इन सबके कारण भारत का विदेशों से व्यापार तो काफी बढ़ गया लेकिन बुनकर एवं शिल्पी यों को उचित कीमत कीमत नहीं मिली।

दूसरी और लक्ष्य था भारत से प्राप्त राजस्व नियंत्रण कर उसे ब्रिटेन के हित में उपयोग करना ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में तथा संपूर्ण एशिया व अफ्रीका में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए युद्ध करना पड़ता था इसके लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता थी इसे भारत से प्राप्त राजस्व श्रीजी निकालने की कोशिश हुई।

ज्यादा नागेश्वर के लिए ज्यादा भूभाग पर नियंत्रण जरूरी था इसके लिए भारत के विभिन्न भागों को जीतकर ब्रिटिश भारत में मिलाने की कोशिश हुई।

जो इलाके कंपनी के अधीन हुए वहां पर कंपनी ने नई प्रकार की भू राजस्व व्यवस्था लागू की जिसके तहत जमींदार जमीन के मालिक बने और जमीन पर निजी स्वामित्व स्थापित हुआ।

अंग्रेजों की उम्मीद थी कि इससे उन्हें अधिकतम भू राजस्व मिलेगा किस नीति का दूरगामी असर यहां पड़ा कि किसानों की स्थिति लगातार बिगड़ती गई और वे अभूतपूर्व मानव निर्मित आकलन के शिकार होने लगे वह बढ़ते हुए राजस्व को अदा करने के लिए ऋण लेकर साहूकार के चंगुल में फंसते गए।

दूसरा दा और इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति और भारत का उपनिवेशी करण

सन 1750 से सन 1800 में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति शुरू हो गई थी लेखाधिकारी व्यवस्था उद्योग पतियों के हित के अनुकूल नहीं थी वे नहीं चाहते थे कि भारतीय कपड़े यूरोप में बिके उल्टा वे चाहते थे कि भारत उनके कारखानों में निर्मित कपड़े खरीदे।

उन्होंने दबाव डाला कि भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण समाप्त हो धीरे-धीरे ब्रिटेन की संसद ने भारतीय मामलों पर दखल बढ़ाया और ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार को सन 1813 में समाप्त कर दिया सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद संसद ने भारत का प्रशासन सीधे अपने हाथों में ले लिया।

भारत की व्यापारिक नीतियों में बहुत सारे बदलाव किए गए ब्रिटेन से आने वाले सामानों का आयात शुल्क को या तो कम कर दिया गया या फिर समाप्त कर दिया गया ताकि भारत में अंग्रेजी का खानों में बना सामान बिक सके ।

लाखों जुलाहे जो कल तक कपड़ा बनाने के काम में लगे हुए थे ग्रज कार हो गए कोई काम-धंधा नहीं मिलने पर वे भी खेती करने लगे इससे कृषि का आबादी का दबाव बढ़ने लगा उतनी ही जमीन पर अधिक लोग निर्भर हो गए इस पूरी प्रक्रिया को भारत का निरूद्योगी करण कहा जाता है इससे हिंदुस्तान गरीब देशों की श्रेणी में आ गया।

भारत के गरीब होने के पीछे एक और कारण था विभिन्न तरीकों से अंग्रेजों द्वारा भारत से इंग्लैंड भेजा जाना भारतीय राजाओं के खजाने की लूट अंग्रेजी सैनिकों व अफसरों के वेतन आदि के रूप में भारतीय धन इंग्लैंड भेजा गया यह भुगतान भारत के किसानों के द्वारा चुकाए गए करोड़ से होता था।

औद्योगिकरण के लिए नील कपास पटसन जैसे कच्चे माल और अनाज चाय और शक्कर जैसी कृषि उपज की अधिक जरूरत थी इन्हीं सस्ते में खरीदकर वे ब्रिटेन भेजना चाहते थे औपनिवेशिक सरकार ने किसानों पर दबाव डाला कि वे इन्हें व्यापारिक फसलों के रूप में उगाए और बेचे क्योंकि किसानों को लगान चुकाना था वे विवश थे व्यापारिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक सिंचाई परियोजनाओं को अंजाम दिया जिससे खेती के लिए पर्याप्त पानी मिल सके।

साथ साथ उसने देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेल लाइनें बिछाई भारत में रेलवे के विकास के लिए अधिकांश सामान से खरीदा गया।

इस कारण वहां के लोहा उद्योग को काफी फायदा हुआ इस प्रकार भारतीय कृषि को ब्रिटेन उद्योगों की जरूरत के अनुसार ढाला गया नकदी फसल का उत्पादन बढ़ा और कपड़ों की जगह उनका निर्यात होने लगा।

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Industrialisation

भारत में निरूद्योगी करण और औद्योगीकरण की शुरुआत

भारत में निरूद्योगी करण और औद्योगीकरण की शुरुआत
सन 15 सबसे 1720 जानी ब्रिटेन में औद्योगिकरण से पहले भारत में कपड़ा उद्योग सहित विभिन्न तरह के उद्योग अपने चरम पर थे भारतीय कारीगर उत्तम गुणवत्ता के कपड़े बुनते थे जिसकी विश्वभर में बड़ी मांग थी इसी व्यापार से फायदा उठाने के लिए यूरोप के व्यापारी भारत आए बढ़ती मांग को देखते हुए भारतीय व्यापारियों ने तेजी से बढ़ाया। इसी व्यापार पर अधिक नियंत्रण पाने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपना राज्य बनाया चलिए पढ़ते ही नीचे इसका हमारे देश के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा।

 बुनकरों का क्या हुआ

सन 1760 के दशक के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के राज की स्थापना के पश्चात महाराज के कपड़ा निर्यात में गिरावट नहीं आई इसका कारण यह था कि ब्रिटिश कपड़ा उद्योग अभी विकसित नहीं हुआ था और यूरोप में वहीं भारतीय कपड़ों की भारी मांग थी इसलिए कंपनी भी भारत से होने वाले कपड़े के निर्यात को ही और फैलाना चाहती थी।

भारत में मैनचेस्टर का आना

सन 1772 में ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर तुला ने कहा था कि भारतीय कपड़े की मांग कभी कम नहीं हो सकती क्योंकि दुनिया के किसी और देश में इतना अच्छा माल नहीं बनता लेकिन हम लेते हैं कि 19 वीं सदी की शुरुआत में भारत के कपड़े याद में गिरावट आने लगी जो लंबे समय तक जारी रही सन 1811 से 1812 में कुल निर्यात में सूती माल का हिस्सा 33% था सन 18 सो 50 से 18 57 में यह मात्र 3% रह गया ऐसा क्यों हुआ इसके क्या प्रभाव हुए?

जब इंग्लैंड में कपड़ा उद्योग विकसित हुआ तो वहां के उद्योगपति दूसरे देशों से आने वाले आयात को लेकर शिकायत करने लगे उन्होंने सरकार पर दबाव डाला कि आयातित कपड़े पर आयात शुल्क वसूल करें जिससे में बने कपड़े भारी प्रतिस्पर्धा के बिना इंजन में आराम से बच सकें दूसरी तरफ उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला कि वह ब्रिटिश कपड़ों को भारतीय बाजारों में भी भेजें 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन के वस्त्र उत्पादों के निर्यात में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

इस प्रकार भारत में कपड़ा बुनकरों के सामने एक साथ दो समस्याएं थी उनका निर्यात बाजार गिरा था और स्थानीय बाजार सिकुड़ने लगा था स्थानीय बाजार में मैनचेस्टर से आयातित सामानों की भरमार थी।

कम लागत पर मशीनों से बनने वाले आयातित कपास उत्पादक ने सस्ती ठीक की बुनकर उनका मुकाबला नहीं कर सकते थे सन अट्ठारह सौ पचास के दशक तक देश के बुनकर इलाकों में ज्यादातर बदहाली और बेकारी किसी किस्से की भरमार थी।

सन 18 सो साठ के दशक में बुनकरों के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई मैं अच्छा का पास नहीं मिल पा रहा था क्योंकि ब्रिटेन अपने कारखानों के लिए भारत से कपास मंगाने लगा था।

भारत में कारखानों का आना

भारत में कहां-कहां पहला मिल सन 18 54 लगा दो साल बाद उसमें द्वारा शुरू होने लगा 18262 तक वहां ऐसे चार मिले काम कर रहे थे उनमें चरण में 1000 तक लिया और 21 साल के थे उस समय बंगाल में जूट मिलने लगी वहां देश की पहली जूट मिल सन 18 55 में और दूसरा 7 साल बाद 18 साल में चालू हुआ।

उत्तरी भारत में एल्गिन मिल अट्ठारह सौ साठ के दशक में कानपुर में गुलाब के साल भर बाद अहमदाबाद का पहला कपड़ा मिल भी चालू हो गया 18 से 74 में मद्रास में भी पहला कताई और बुनाई मिल खुल गया।

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में सन 1894 में सीपी मिल प्रारंभ हुआ विशेषण 1986 बीएमसी कहा जाने लगा।

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वैचारिक औपनिवेशिकरण क्या है

वैचारिक औपनिवेशिकरण
पिछली पोस्ट में हमने पढ़ा की अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव कैसे थे लेकिन औपनिवेशिक रण इससे और आगे लोगों की सोच पर हावी होने का प्रयास करता है यह कैसे आइए एक एग्जांपल से समझते हैं

जब अंग्रेज भारत में अपना राज्य बनाने लगे तो उनमें से कई लोगों ने भारतीयों की संस्कृति इतिहास आदि को जानने समझने का भरसक प्रयास किया वे भारतीय संस्कृति और धर्म आदि से काफी प्रभावित हुए उन्होंने कंपनी सरकार से आग्रह किया कि पारंपरिक भारतीय ज्ञान और साहित्य के अध्ययन को संरक्षण देना जरूरी है।

उनके कहने पर संस्कृत कॉलेज और मद्रासी खोले गए इस विचार के लोगों को राष्ट्रवादी कहते हैं रानी पूर्ण अर्थात वे लोग जो पूर्वी संस्कृति से प्रेरित थे।

सन 1800 के बाद कंपनी के कई और अधिकारी हुए जिन्होंने यह माना कि आधुनिक यूरोप का जान ही जानने योग्य है और यह अंग्रेजी के माध्यम से ही हो सकता है उनका मानना था कि भारतीय ज्ञान की परंपरा किसी काम की नहीं है और उस पर धन खर्च करना व्यर्थ है इन्हें अंगनावादी अर्थात अंग्रेजी संस्कृति और शिक्षा से पीड़ित लोग कहते हैं।

जब अंग्रेजी सरकार की शिक्षा नीति बनी तब आंग्ल वादी विचार के लोग अधिक प्रभावी रहे इनमें सबसे प्रसिद्ध थे थॉमस मैकाले जिन्होंने सन 1830 में अपनी सिफारिश प्रस्तुत की

मैकाले का कहना था

इस बात को सभी मानते हैं कि भारत और अरब के संपूर्ण देसी साहित्य एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक सेल्फ के बराबर ही है यूरोपीय काव्य इतिहास विज्ञान और दर्शन की पुस्तकों की तुलना में इन में कुछ भी नहीं है उनका आग्रह था कि भारतीयों की भलाई इसी में है कि उन्हें विज्ञान गणित पाश्चात्य दर्शन आदि की शिक्षा दी जाए ताकि वे अंधविश्वास और बर्बरता से मुक्त हो जाएं।

मैकाले का आग्रह था कि कुछ चुने गए भारतीयों को अंग्रेजी शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि वे अंग्रेजी शासन के समर्थक बने और अन्य भारतीयों को भी सिखाए

औपनिवेशिकरण का एक तुलनात्मक अध्ययन

हमने पढ़ा कि लैटिन अमेरिका अफ्रिका इंडोनेशिया चीन भारत आदि अलग-अलग प्रकार से अपनी वशीकरण से प्रभावित हुए एक तरह का उपनिवेश ई करण लैटिन अमेरिका में देखा जा सकता है लैटिन अमेरिका में रहने वाले अधिकांश मूलनिवासी मारे गए और वहां यूरोप के लोग आकर बसे तथा अफ्रीका से लोगों को दाल बना कर जबरदस्ती वहां बसाया गया।

यूरोपीय देश इस तरह बताए गए उन निवेशकों का अपने फायदे के लिए शोषण करना चाहते थे इस का उपनिवेश के लोगों ने विरोध किया दास प्रथा बेगारी और औपनिवेशिक नीतियों के विरोध में स्वतंत्रता आंदोलन सफल रहे।

एशियाई देश जैसे इंडोनेशिया वह भारत में औपनिवेशिक रण लेटिन अमेरिका सिविल न था यहां यूरोप के देशों ने अपना राज्य स्थापित किया और स्थानीय अर्थव्यवस्था को अपने हितों के अनुरूप बदला किंतु इंडोनेशिया और भारत में भी फर्क था इंडोनेशिया जंगल काटकर बागान बनाए गए जिनके मालिक हॉलैंड के लोग थे।

भारत में भी पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह के बागान बने लेकिन बाकी क्षेत्रों में लगान और व्यापारिक खेती के माध्यम से किसानों का शोषण किया गया सबसे महत्वपूर्ण भारत के उद्योगों को पनपने नहीं दिया गया जिससे भारतीय कपड़ा उद्योग का विनाश हुआ।

चीन की कहानी इन सबसे अलग रही वहां शासक तो चीनी ही बने पर चीन के विभिन्न हिस्सों पर यूरोपीय देशों का वर्चस्व था जहां वे शासन की जिम्मेदारी के बिना वहां के लोगों तथा संसाधनों का दोहन करते रहे इन सब देशों में औपनिवेशिक रण के प्रतिरोध की कहानी भिन्न भिन्न है हम खुद लैटिन अमेरिका की भारत और अफ्रीका के प्रतिरोध की तुलना कर सकते हैं।

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साम्राज्यवाद क्या है साम्राज्यवाद का अर्थ

साम्राज्यवाद का अर्थ

जब कोई शक्तिशाली राष्ट्र किसी दुर्बल राष्ट्र के आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन पर नियंत्रण स्थापित कर उनका शोषण करता है तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं दूसरे शब्दों में जब कोई राष्ट्र शक्ति का प्रयोग कर किसी अन्य राष्ट्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेता है तथा उसके आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों का हनन करके उसे अपने नियंत्रण में ले लेता है तो ऐसा राष्ट्र साम्राज्यवादी कहलाता है और इस प्रवृत्ति को साम्राज्यवाद कहते हैं।

साम्राज्यवाद की परिभाषा

साम्राज्यवाद वह अवस्था है जिसमें पूंजीवादी राज्य शक्ति के बल पर दूसरे देशों के आर्थिक जीवन पर अपना नियंत्रण स्थापित करते हैं
                                 – डॉ. संपूर्णानंद

शक्ति और हिंसा के द्वारा किसी राष्ट्र के नागरिकों पर विदेशी शासन तक नहीं साम्राज्यवाद है।
                                              – शूमां

साम्राज्यवाद के विकास की अनुकूल परिस्थितियां

१. औद्योगिक क्रांति
अब तक एशिया और अफ्रीका के देशों में औद्योगिक क्रांति नहीं आई थी यहां होने वाले उत्पादन का उपयोग प्राचीन ढंग से हाथों द्वारा ही होता था अतः यहां पर साम्राज्यवादी देशों के लिए उपयुक्त बाजार एवं कच्चा माल उपलब्ध था।

२. सैन्य शक्ति कमजोर
एशिया एवं अफ्रीका के देश सैनिक दृष्टि से अत्यधिक कमजोर थे वे यूरोपीय शक्ति के आगे टिक नहीं सकते थे ना तो उनके पास आधुनिक हथियार होते थे और ना ही संगठन की शक्ति उन्हें प्रशिक्षण भी ऐसा नहीं दिया जाता था कि वे सक्षम सैनिकों या प्रशिक्षित सेनाओं का मुकाबला कर सके।

३. राष्ट्रीय एकता का अभाव
पश्चिमी देशों की तरह एशिया और अफ्रीका के राज्य एकता के सूत्र में बंधे हुए नहीं थे वह आपसी स्वार्थों को लेकर आपस में लड़ते झगड़ते थे वह कभी संगठित होकर बाहरी शत्रु का सामना नहीं करते थे।

४. मध्यमवर्ग का आभाव
एशिया एवं अफ्रीका के देशों में प्रभावशाली मध्यमवर्ग का अभाव था जनसाधारण राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहता था उसे अपनी रोजी रोटी जुटाने में इस सारी शक्ति लगानी पड़ती थी।

५. राजनीतिक अस्थिरता
शासक वर्ग अपनी विलासिता में डूबा रहता था प्रजा हित के कार्यों में उसकी जरा भी रुचि न थी जनता भी अपने शासकों के प्रति सहानुभूति नहीं रखती थी आए दिन विद्रोह और षडयंत्र एवं मारकाट होते रहते थे इससे प्रशासन की जड़ें कमजोर हो गई थी।

साम्राज्यवाद के प्रभाव

19वीं सदी के अंतिम दशक तक साम्राज्यवाद ने एशिया और अफ्रीका की पूरी तरह अपने पंजों में जकड़ लिया था विश्व की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या पर विदेशी शासकों ने अपना अधिकार कर लिया था साम्राज्यवाद का प्रभाव लोगों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों में पड़ा था।

सकारात्मक प्रभाव:-

१. राष्ट्रीय एकीकरण
साम्राज्यवादी देशों ने अपने उपर निवेशकों में एक ही तरह के कानून न्याय व्यवस्था और आर्थिक नीति लागू की साम्राज्यवादी देश पूरे उपनिवेश को एक राजनीतिक और आर्थिक इकाई मानकर शासन करते थे जिसके फलस्वरूप उपनिवेश की जनता में एकता और राष्ट्रीयकरण की भावना उत्पन्न हुई हमारा भारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

२. यातायात और संचार के साधनों में सुधार
अपनी उपनिवेशन का पूरी तरह से शोषण के लिए साम्राज्यवादी देशों में उपनिवेश ओं में यातायात एवं संचार के साधनों में सुधार किया जिसके फलस्वरूप निवेशकों को नवीन यातायात और संचार के साधन प्राप्त हुए और वहां पर रेलवे एवं टेलीफोन जैसे साधनों का विकास हुआ।

३. आंशिक उदारीकरण
यूरोप की पूंजी पतियों का था सरकार ने अधिक लाभ कमाने के लिए निवेशकों में कुछ आधुनिक उद्योग भी लगाए।

४. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार
औपनिवेशिक देशों में अपने व्यापार व उद्योगों को चलाने के लिए बहुत अधिक संख्या में कलर को एवं छोटे कर्मचारियों की आवश्यकता को देखते हुए साम्राज्यवादी देशों ने वहां पर पाश्चात्य ढंग की शिक्षा भाषा एवं साहित्य का प्रचार प्रसार किया इसके फलस्वरूप उपनिवेश ओं में पश्चिमी विचारधारा का प्रचार हुआ सांची वहां स्वतंत्रता समानता तथा लोकतंत्र के प्रति प्रेम विकसित हुआ।

५. नए प्रदेशों की खोज
साम्राज्यवाद के प्रसार के कारण विश्व के अनेक नए प्रदेशों की खोज की गई साम्राज्य वादियों ने वहां पर अपनी उपनिवेश बताएं जिससे विश्व के विभिन्न भागों में सभ्यता और संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ।

नकारात्मक प्रभाव

१. आर्थिक शोषण

साम्राज्यवादी देश एशिया और अफ्रीका के देशों से सस्ते दामों पर कच्चा माल उठाते और फिर तैयार माल उन्हीं देशों में ऊंचे दामों पर बेचकर भारी लाभ कमाते थे और कृषि क्षेत्र में भी उन्होंने बहुत ज्यादा शोषण किया।

२. आर्थिक पिछड़ापन

साम्राज्यवादी देशों द्वारा अपने उपनिवेश ओं की कृषि और उद्योग एवं व्यापार के विकास में कोई रुचि नहीं ली जाती थी बस उनसे सिर्फ काम करवा कर बहुत ही  कम मजदूरी दिया जाता था।

३. निरंकुश शासन

साम्राज्यवादी देश अपने देश में स्वतंत्रता समानता आदि की बात करते थे किंतु अपने ही उपनिवेश ओं में उनका व्यवहार निरंकुश तथा दमनात्मक रहता था।

४. युद्ध और अशांति

यूरोपीय देश अधिक से अधिक उपनिवेश प्राप्त करना चाहते थे जिसके कारण वे आपस में लगातार युद्ध करने की स्थिति में रहते थे वह सभी जानते थे कि अधिक उपनिवेश रखने से अधिक मात्रा में कच्चा माल प्राप्त करने के स्त्रोत तथा माल बेचने के लिए बाजार उपलब्ध होंगे।

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India

संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका कैसी है ।

1. संघ की स्थापना और चार्टर निर्माण में

सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लेकर भारत उनका मन संस्थापक देशों में से एक सदस्य बना मानव अधिकार और मौलिक स्वतंत्र गांव को भारतीय प्रतिनिधियों की सिफारिश पर चार्टर में जोड़ा गया।

2. संघ की सदस्य संख्या बढ़ाने में

संघ में अपने विरोधी गुट को प्रवेश देने में कई देश रुकावट डालते थे परंतु भारत ने अपने आक्रमणकारी चीन के परिवेश का समर्थन कर संघ की सदस्य संख्या बढ़ाने में प्रेरक कार्य किया।

3. संघ के विभिन्न अंगों का संचालन में

सन 1954 में भारत की सिम की विजय लक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा के आठवीं अधिवेशन के अध्यक्ष निर्वाचित हुई

डॉ राधाकृष्णन और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद यूनेस्को के प्रधान निर्वाचित हुए राजकुमारी अमृत कौर विश्व स्वास्थ्य संगठन डॉ बी आर सी एन विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन बाबू जगजीवन राम अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन डॉ एच जे भाभा अणुशक्ति आयोग के अध्यक्ष डॉ चिंतामणि देशमुख अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अध्यक्ष डॉ नागेंद्र सिंह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जाकर संघ के संचालन में सहयोग कर चुके हैं।

4.संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति व सुरक्षा संबंधी कार्य

1. कोरिया समस्या

उत्तर और दक्षिण कोरिया के युद्ध में विश्वयुद्ध की
संभावनाएं बढ़ रही थी संयुक्त राष्ट्र ने वहां शांति स्थापित करने 16 राष्ट्रों की सेना भेजी उस में भारतीय सैनिक भी शामिल थे जिन्होंने युद्ध बंदियों की अदला बदली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2. हंगरी समस्या

1956 में प्रतिक्रियावादी तत्वों ने हंगरी में विद्रोह कर दिया हंगरी सरकार के अनुरोध पर रूस ने सेना भेजकर विद्रोह को दबा दिया संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत के हंगरी में शांति स्थापना के प्रयासों का समर्थन किया।

3. स्वेज नहर समस्या

26 जुलाई 1956 को मिश्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया स्वेज नहर पर अपना अधिकार भी स्थापित करने के लिए इंग्लैंड फ्रांस और इजरायल ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया भारत ने इन आक्रमणकारी देशों की निंदा कर युद्ध बंद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

4. कांगो समस्या

कांगो के स्वतंत्र होने पर बेल्जियम ने उस पर हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेश से भारत ने अपनी सेना की बड़ी टुकड़ी भेजकर कांगो में युद्ध के खतरे को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. निशस्त्रीकरण हेतु किए गए प्रयास

भारत ने सहयोगी देशों की मदद से सन 1961 में महासभा में आणविक परीक्षणों को बंद करने का प्रस्ताव रखा 1963 में ब्रिटेन अमेरिका और सोवियत रूस के आणविक परीक्षण प्रतिबंध संधि का भारत ने स्वागत किया सन् 1986 में राजीव गांधी ने महासभा में निशस्त्रीकरण की पुल की और सन 1988 से 22 जून तक एक चरणबद्ध कार्यक्रम चलाकर तहत पूर्ण का सुझाव दिया।

6. रंगभेद के विरुद्ध संघर्ष

अफ्रीका और रोड एशिया की गोरी सरकारों द्वारा श्वेतांबर किए जाने वाले अत्याचारों का भारत में प्रबल विरोध किया साथ ही संयुक्त राष्ट्र संघ पर भी भारत ने इस हेतु लगातार दबाव बनाए रखा अल्लाह 22 दिसंबर 1993 में अफ्रीका नेताओं को भी बराबरी का अधिकार मिल गया।

7. उपनिवेशवाद समाप्ति हेतु किए गए प्रयास

भारत में उपनिवेशवाद की समाप्ति और वहां की जनता की स्वतंत्रता के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में जो प्रस्ताव रखा उसे स्वीकार कर लिया गया बांग्लादेश और नामीबिया को मुक्त कराने भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

8. मानव अधिकारों की रक्षा

भारत मानव अधिकारों का सदैव समर्थक रहा 21 दिसंबर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानवाधिकार आयोग का गठन किया भारत ने उच्चायोग के सुझावों को मान्यता दी यह संयुक्त राष्ट्र महासचिव और महासभा के अधीन काम करते हुए नागरिक सामाजिक सांस्कृतिक और अन्य सभी प्रकार के मानव अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए उत्तरदाई है।

9. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में

भारत में संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देशों पर विशेष बल दिया विकसित देशों से अविकसित देशों के लिए अधिकाधिक आर्थिक सहायता देने का अपील की 24 अक्टूबर 1985 में राजीव गांधी ने महासभा के सदस्य देशों से अपील की कि विश्व के शांति के प्रति स्वयं को समर्पित करते हुए विश्व भुखमरी को दूर करने के लिए संघर्ष करें।

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Colonialism

अफ्रीका का उपनिवेशी करण का इतिहास

हमने अमेरिका में अफ्रीकी देशों को बसाई जाने के बारे में पहले ऊपर पढ़ लिया है यूरोपीय देशों द्वारा अफ्रीका के उपनिवेश ई करण की शुरुआत सन 19 वीं सदी के मध्य में हुई 1878 तक अफ्रीका की केवल 10% जमीन पर यूरोपीय देशों का कब्जा था लेकिन महज 36 वर्षों में 1914 तक लगभग सारा महावीर किसी न किसी यूरोपीय देश का उपनिवेश बन गया।

दास व्यापार

उन्नीसवीं सदी के मध्य तक अफ्रीका में ज्यादातर हिस्से कली लाई समूहों से आवा था जीवन यापन के लिए मुख्य साधन पशुपालन कृषि जंगल से इकट्ठे किए गए कंदमूल एवं शिकार होते थे मध्य काल में भारत पश्चिमी एशिया और यूरोप में भी अफ्रीका महाद्वीप देशों की आपूर्ति के मुख्य स्त्रोत के रूप में जाना जाता था।

कबीलाई समूह के आपसी झगड़े में जो लोग युद्ध बंदियों के रूप में पकड़े जाते थे उनको दास के रूप में भेज दिया जाता था सन 1500 के बाद उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका में खेती करने के लिए जैसे जैसे मजदूरों की जरूरत पड़ी वैसे वैसे अफ्रीका महाद्वीप से ताशों का व्यापार भी बढ़ता चला गया।

कई यूरोपीय देश इस अति लाभदायक मानव व्यापार में लग गए और करोड़ों अफ्रीकी यों को बेचकर खूब मुनाफा कमाया 450 साल से अधिक चले इस व्यापार को सन 1800 और सन 1900 के बीच धीरे-धीरे बंद किया गया।

मजेदार बात यह है कि अब यूरोपीय देश या कहने लगे कि अफ्रीका में दास व्यापार को खत्म करने के लिए उन्हें अफ्रीका पर अपना राज्य बनाने की जरूरत है उनमें अब होल्ड लग गई कि कौन अफ्रीका में सबसे अधिक जमीन पर कब्जा कर पाता है।

औद्योगिक क्रांति साम्राज्यवादी होड और अफ्रीका

ब्रिटेन जैसे प्रारंभिक देश ने अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल एवं बाजार की तलाश में दुनिया के बड़े हिस्से पर खासकर एशियाई देशों पर कब्जा कर लिया था जर्मनी फ्रांस और इटली में औद्योगिक क्रांति लगभग 100 साल बाद हुई।

इन नव उद्योग देशों के लिए अफ्रीका ही एक ऐसा क्षेत्र था जिस पर कब्जा करने की संभावना थी।

वर्चस्व वादी विचारधारा 

यूरोप में इस समय कुल ऐसे विचार लोकप्रिय हो रहे थे जो यूरोपीय देशों को ज्यादा से ज्यादा उपनिवेश बनाने के लिए प्रेरित कर रहे थे उपनिवेश बनाना राष्ट्रीय शक्ति का पर्याय समझा जाता था और उपनिवेश के प्रसार के लिए काम करना राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति मानी जाती थी।

यूरोप में बहुत से लोगों का मानना था कि विश्व में मनुष्यों की कई नस्लें होती है और यूरोपीय नस्ल बाकी दुनिया की नस्लों से बेहतर है।

यह मानना कि मनुष्य की नस्लें होती है और एक नस्ल को दूसरी नस्ल से बेहतर माना नस्लवाद का जाता है नस्लवादी यह भी मानते हैं कि श्रेष्ठ नस्ल के लोगों का कमजोर नसों पर राज करना या उनका शोषण करना जरूरी और स्वाभाविक है।

अफ्रीका के दक्षिणी इलाकों में जैसे-जैसे दक्षिण अफ्रीका जिंबाब्वे आदि में कई यूरोपीय लोग जाकर बसें यहां तक कि भारत से भी बहुत से लोग वहां जाकर बसें।

वे सब अपने आप को स्थानीय श्वेत लोगों से श्रेष्ठ समझते थे और उन्हें कई बार विशेषाधिकार प्राप्त थे वह जहां प्रयास करते रहे कि विभिन्न मूल के लोगों का आपस में मेल मिलाप ना हो और नस्ला आधारित विशेषाधिकार बने रहें इससे रंगभेद की नीति बनी जो सन 1994 तक चली।

औपनिवेशिक काल में एक और विचार गोरे लोगों का भुजा बहुत लोकप्रिय हुआ था इस विचार के अनुसार दूसरे महाद्वीप के लोग पिछड़े हुए हैं इसलिए यूरोप के लोगों का नैतिक दायित्व है कि उन लोगों को सभ्य बनाया जाए।

इस विचार के अनुसार यूरोपीय देशों का यह कर्तव्य है कि विशेष संसार के देशों को ज्ञान और धर्म के मुद्दों पर पथ प्रदर्शित करें इस विचार को उत्साहित होकर बहुत से लोग अफ्रीका में इस आई या फिर आधुनिक विज्ञान वह तार्किक सोच के प्रचार-प्रसार में भी लग गए।

फरान जैसे कई यूरोपीय देश अपने उपनिवेश ओं में अफ्रीकी लोगों का एक ऐसा समूह तैयार करना चाहते थे जो यूरोपीय भाषा और संस्कृति धर्म और विचारों को अपनाने और औपनिवेशिक शासन की मदद करें इस उद्देश्य से अफ्रीका में कई यूरोपीय विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान खोले गए।

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WordPress plugin

बिजनेस वेबसाइट के लिए कौन से plugin बेहतरीन है

 1. WPForms

यह पैकिंग बिजनेस वेबसाइट का एक बेहतरीन उपकरण माना जाता है हर वेबसाइट को एकदम पर फोन किया सकता होती है क्योंकि बिजनेस वेबसाइट पर विजिट करने वाले लोगों के बारे में जानकारी आसानी से आप तक पहुंच सकती है इसके लिए जैसे ही कोई आगंतुक आपकी वेबसाइट पर आता है तो उसके सामने यह फॉर्म खुलता है जब यह व्यक्ति अपनी जानकारी इस फोन के जरिए आप तक पहुंचाता है तो आप इस व्यक्ति से आसानी से संपर्क कर सकते हैं और अपने व्यापार संबंधित बातचीत कर सकते हैं


 2. Yoast SEO

स्किन की माध्यम से आप अपनी वेबसाइट पर ज्यादा से ज्यादा विजिटर ला सकते हैं तथा वेबसाइट को गूगल पर रंग करवा सकते हैं यह सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन उपकरण काफी अनुकूल plugin माना जाता है

Yoast SEO अब तक के सबसे लोकप्रिय WordPress plugin में से एक है। वर्डप्रेस उपयोगकर्ता सबसे ज्यादा इस उपकरण की माध्यम से अपनी वेबसाइट को रैंक करवाते हैं यह उपकरण चलाने में काफी आसान तथा आसानी से इस उपकरण के माध्यम से अपनी वेबसाइट को नहीं कराया जा सकता है इसीलिए यह उपकरण लोगों की पहली पसंद बन चुका है  सभी वर्डप्रेस एसईओ प्लगइन्स में से, योस्ट उन सभी सुविधाओं और उपकरणों के साथ सबसे व्यापक समाधान प्रदान करता है जिन्हें आपको अपने ऑन-पेज एसईओ में सुधार करने की आवश्यकता होती है।
 3.  लगातार संपर्क

ई-मेल आपके व्यवसाय के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है बिजनेस वेबसाइट के लिए ईमेल फॉर्म वेबसाइट पर रखना बहुत ही लाभदायक तथा विजिटर से प्रभारी तरीके से विश्वसनीय संबंध बनाए जा सकते हैं यह आपको अपनी वेबसाइट पर आने वाले विजिटर में एक रिलेशन पैदा करता है जिससे आप विजिटर की ईमेल आईडी से उस से कोंटेक्ट में रह सकते हैं यह आपको अपनी वेबसाइट छोड़ने के बाद भी अपने उपयोगकर्ताओं के साथ संपर्क में रहने की अनुमति देता है।  यही कारण है कि हम प्रत्येक व्यवसाय स्वामी को तुरंत एक ईमेल सूची बनाने की सलाह देते हैं।

 4. UpdateraftPlus

UpdateraftPlus बाजार का सबसे लोकप्रिय बैकअप उपकरण माना जाता है इस उपकरण की सहायता से आप अपने बिजनेस वेबसाइट पर डाली गई सभी पोस्ट तथा इमेज का बैकअप लेकर  रख सकते हैं  ताकि कभी  आपकी वेबसाइट इन एक्टिव हो जाए तो उसे पुनः एक्टिव करने में  सहायता हो सकती है यह बाजार पर सबसे लोकप्रिय वर्डप्रेस बैकअप प्लगइन है।  यह आपको स्वचालित बैकअप सेट करने और Google ड्राइव, ड्रॉपबॉक्स, S3, रैकस्पेस, एफ़टीपी, ईमेल, आदि जैसे दूरस्थ स्थान पर सुरक्षित रूप से संग्रहीत करने की अनुमति देता है।
 5. WP रॉकेट

वर्डप्रेस राकेट बाजार मैं वर्डप्रेस  कैशिंग उपकरण माना जाता है। यह उपकरण वेबसाइट की गति तथा स्पीड को नियंत्रित करता है अगर आप एक ब्लॉगर है या आपकी कोई बिजनेस वेबसाइट है जिस पर आप अपना बिजनेस कर रहे हैं तो उस वेबसाइट की स्पीड आपके व्यवसाय तथा वेबसाइट के रैंक करने में काफी ज्यादा इफेक्ट करती है इसीलिए आप की वेबसाइट की स्पीड ज्यादा होनी चाहिए जिससे आने वाली विजिटर लोडिंग टाइम कम होने के कारण आपकी वेबसाइट की ओर अपना इंटरेस्ट दिखा सके  |

यह स्वचालित रूप से अनुशंसित वर्डप्रेस कैशिंग सेटिंग्स जैसे कि जीज़िप संपीड़न, पेज कैश और कैश प्री-लोडिंग को चालू करता है।  आप पेज लोड समय को और बेहतर बनाने के लिए आलसी लोडिंग इमेज, सीडीएन सपोर्ट, डीएनएस प्री-क्लचिंग, मिनिफिकेशन जैसी वैकल्पिक सुविधाओं को भी चालू कर सकते हैं। 

आज आपने क्या सिखा बिज़नस वेबसाइट प्लगइन के बारे में 

मुझे उम्मीद है, की आपको अब बिज़नस वेबसाइट पर कौन से प्लगइन यूज़ करने सबसे better साबित होगा, इस टॉपिक्स से रिलेटेड कोई सवाल हो, तो कमेंट करके आप हमसे पूछ सकते है, 

तो दोस्तों अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया हो तो प्लीज इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर से जरूर शेयर करे, 
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On Page SEO क्या है? Step By Setp पूरी जानकारी हिंदी में

On Page SEO क्या है?

On Page SEO वेबसाइट को गूगल में रैंक करवाने के लिए काफी मदद करता है। इस SEO में आपको वेबसाइट पर डाले जाने वाले आर्टिकल का SEO करना होता है। अगर आपके आर्टिकल का 100% SEO हो तो आपकी वेबसाइट गूगल पर रैंक करने में काफी आसानी हो जाती है। और आपकी साइड की रैंकिंग भी काफी अच्छी रहती है। SEO के अंदर कई टिप्स को फॉलो करना पड़ता है। और उन्हीं टिप्स की मदद से आप On Page SEO को आसानी से कर सकते हैं।


On Page SEO कैसे किया जाता है?

On Page SEO करने के लिए आर्टिकल का SEO करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। और आर्टिकल का SEO आपकी वेबसाइट की DA/PA (Domain Authority/ Page Authority) और वेबसाइट की रैंकिंग अच्छी रखता है। On Page SEO करना बिल्कुल आसान होता है और इसको करने में ज्यादा समय भी नहीं लगता है। आइए जानते हैं पूरा विस्तार से स्टेप बाय स्टेप.

Yoast SEO के मुताबिक On Page SEO कैसे करें।

Yoast SEO Plugin के मुताबिक आर्टिकल का आॅन पेज एसईओ कैसे किया जा सकता है। और आर्टिकल को गूगल पर आसानी से रैंक भी किया जा सकता है। Yoast SEO Plugin दो प्रकार के होते हैं. पहला :- Free Yoast SEO Plugin दूसरा :- Primum Yoast SEO Plugin

1. Free Yoast SEO Plugin

Free Yoast SEO Plugin के अंदर आप आर्टिकल का Basic SEO कर सकते हैं। और आर्टिकल को गूगल पर रैंक करवा सकते हैं। इस Plugin के अंदर आपको Totally 14 टास्क होते हैं। जिनको कंप्लीट करना रहता है। इनमें से मुख्य चार टास्क होते हैं। जो एसक्यू को ग्रीन करने में हेल्प करते हैं। और 5 टास्क आर्टिकल की Redability को ग्रीन करने के लिए होते हैं।

SEO 14 Task’s:-


(1.) outbound Link’s:- इस Task के अंदर आपको अपने आर्टिकल के अंदर एक कोई ऐसे वर्ड का लिंक बनाना है।जो लिंक आपकी वेबसाइट से बाहर की हो। यानी किसी दूसरी वेबसाइट के लिंक आपके वेबसाइट में डालनी हो। वह भी किसी एक word के ऊपर मैं आपको Recomment करूंगा कि आप ज्यादातर कोशिश करें. कि विकिपीडिया की ही लिंक डालें.

(2.) Internal Link’s:- इस Task के अंदर आपको अपनी ही वेबसाइट के किसी दूसरे आर्टिकल की लिंक इस आर्टिकल में डालने को बोला जाता है। यानी कि आपकी वेबसाइट पर पहले किसी भी आर्टिकल को अगर आप डाल रखा है। तो उसी आर्टिकल की लिंक को इस आर्टिकल में डाल देंगे। तो आपका यह तर्क भी कंप्लीट हो जाएगा।

(3.) Meta Description:- इस Task के अंदर आपको अपने आर्टिकल का Meta Description बनाना होता है। इसके अंदर आप अपने आर्टिकल के सबसे पहले पैराग्राफ में से 35 word को सिलेक्ट करके मेटा डिस्क्रिप्शन के बॉक्स के अंदर डालते हैं। इतना करने के बाद आपका यह टास्क भी Secessfully Complete हो जाएगा।

(4.) Image ALT Taxt:- इस Task के अंदर आपको अपने आर्टिकल के अंदर डाले जाने वाले फोटो का ALT Taxt डालना रहता है। यानी आप जब अपने आर्टिकल का फीचर फोटो डालते हो। तो साइड में आपको चार बॉक्स देखने को मिलते हैं। जिसमें पहला नंबर ALT Taxt दूसरा नंबर Title तीसरा Caption और चौथा Description होता है। इन चारों को आपको फील करना होता है। और यह फील करने के बाद आपका यह टास्क भी कंप्लीट हो जाता है।

(5.) Keyshper In SEO Title:- इस Task के अंदर आपके आर्टिकल का Mean Keyword आपके आर्टिकल के Title के अंदर होना चाहिए। यानी आपके आर्टिकल का जो मुख्य टाइटल होता है। उसके स्टार्टिंग में आपके आर्टिकल का कीवर्ड होना अनिवार्य होता है। यह काम करने के बाद आपका यह टास्क भी पूरा हो जाता है।

(6.) Keyphrase In Sulg:- इस Task अंदर आपको एक Sulg का ऑप्शन मिल जाता है। उसके अंदर आर्टिकल के मैन कीवर्ड को डालना रहता है। यह Sulg आपके आर्टिकल की एक लिंक तैयार करता है। जिसे हम Prmalink कहते हैं। यह कार्य करने के बाद आपका यह टास्क भी कंप्लीट हो जाता है।

(7.) Keyphrase In Meta Description:- इस टास्क के अंदर आपको सामान्यतः मेटा डिस्क्रिप्शन के अंदर आर्टिकल का मेन कीवर्ड डाला रहता है। मेटा डिस्क्रिप्शन के अंदर आर्टिकल का कीवर्ड होना बहुत आवश्यक होता है। और यह आर्टिकल को रैंक करने में काफी मदद भी करता है। यह काम करने के बाद आपका यह टास्क भी पूर्ण हो जाता है।

(8.) Keyphrase In Introduction:- इस टास्क के अंदर आपको आर्टिकल के सबसे पहले पैराग्राफ के अंदर कीवर्ड को डालना होता है। Yoast SEO के मुताबिक आपको मेन हैडिंग के ऊपर एक 30-40 का छोटा सा आर्टिकल इंट्रो लिखना रहता है। और इसको डालने के बाद आपका यह टास्क भी कंप्लीट हो जाता है।

(9.) Keyphrase density:- इस टास्क के अंदर Yoast SEO आपको यह बोलता है। कि आपके आर्टिकल के अंदर कीवर्ड को कम से कम 3 बार रिपीट करना होता है। और ज्यादा से ज्यादा 5 बार. आपको आर्टिकल में 3 बार से कम और 5 बार से ज्यादा कीवर्ड को नहीं डालना चाहिए। यह करने के बाद आपका यह टास्क भी कंप्लीट हो जाता है।

(10.) Keyphrase Length:- इस Task अंदर आपको कीवर्ड की लेंथ के बारे में बताया जाता है। Yoast SEO का कहना है। कि आप अपने आर्टिकल के कीवर्ड की लेंथ मिनिमम 2 वर्ड से मैक्सिमम 4 वर्ड तक रख सकते हैं। इससे कम या ज्यादा करने पर आपका Yoast SEO कंप्लीट नहीं हो पाएगा।

(11.) Keyphrase In Subheading:- इस टास्क के अंदर आपको अपने आर्टिकल के सबहेडिंग के अंदर कीवर्ड को रखना होता है। और सबहेडिंग के अंदर की वोट डालने के बाद आपका यह टास्क भी सक्सेसफुली कंप्लीट हो जाता है।

(12.) Previously used keyphrase:- इसके अंदर आपको Yoast SEO Plugin यह बोलता है। कि आप अगर Same कीवर्ड को दूसरी बार रिपीट करते हैं। यानी दूसरे आर्टिकल के अंदर भी same Keyword है। तो आपका यह टास्क कंप्लीट नहीं किया जाएगा। क्योंकि हर आर्टिकल के अंदर आपको कुछ नया कीवर्ड डाला रहता है।

(13.) SEO Title Width:- इस टास्क के अंदर आपको अपने आर्टिकल का मेन टाइटल ज्यादा बड़ा नहीं करना होता है। इस टास्क के मुताबिक आपको अपने आर्टिकल का टाइटल viewable रखना होता है। और ऐसा करने पर आपका यह टास्क अभी कंप्लीट हो जाता है।

(14.) Text Length:- इस Task के अंदर Yoast SEO Plugin आपको यह बोलता है। कि आपके आर्टिकल की लेंथ कम से कम 300 वर्ड से ज्यादा होने चाहिए। और ज्यादा से ज्यादा आप कितनी भी रख सकते हैं। लेकिन मैं आपको कहुंगा कि आप अपने आर्टिकल की लेंथ 500 वर्ड से ज्यादा ही रखें। और अगर आप लिख सकते हैं। तो 2000 वर्ड तक भी लिख सकते हैं। क्योंकि जब आप का आर्टिकल ज्यादा बड़ा होगा तो यह गूगल में रैंग करने में काफी मदद भी करता है।

on Page SEO के लिए Yoast SEO plugin में आपको एक और फिचर मिलता है। जो आपके पोस्ट और वेबसाइट को रैंग करने में मदद करता है। उस फिचर का नाम है। Redability फिचर भी अगर आप 100% Good कर देते हैं। तो आपका आर्टिकल रैंक होने में काफी मदद करता है। यह Redability में आपStepको अपने आर्टिकल को अच्छी तरह से व्यवस्थित ढंग से सजाने के लिए कहा जाता है। और उसमें भी कुछ स्टेप्स होते हैं। जिनको आप को फॉलो करना रहता है।